दावत ए इफ़्तार,देश की साझी विरासत है.आपसी भाईचारा,सामाजिक सौहार्द की मिसाल है.यह हमारी गंगा जमनी तहज़ीब की जड़ों को तनावर करती हैं.हिंदुस्तान की असल पहचान है.इस बार दावत ए इफ़्तार की झड़ी लगी है.कोविड ने दो साल ब्रेक लगा दिया था.

सेराज अनवर

होली पर रिपोर्ताज पढ़ा होगा गया से.इस वक़्त आप दावत ए इफ़्तार की दास्तान पढ़ रहे हैं पटना में.गया जन्म भूमि है मेरा,पटना कर्मभूमि.शायद अब लोगों ने यहां की नागरिकता भी दे दी है.दो दशक से यहीं हूं.लोग अब थोड़ा-थोड़ा पहचानने लगे हैं.दावतों में बुलाते हैं.अमूमन जाता नहीं हूं.आदत मेरी ख़राब है. होली और दावत ए इफ़्तार,देश की साझी विरासत है.आपसी भाईचारा,सामाजिक सौहार्द की मिसाल है.यह हमारी गंगा जमनी तहज़ीब की जड़ों को तनावर करती हैं.हिंदुस्तान की असल पहचान है.इस बार दावत ए इफ़्तार की झड़ी लगी है.कोविड ने दो साल ब्रेक लगा दिया था.रविवार को मैं भी दावत ए इफ़्तार का गवाह बना.पूर्व वार्ड काउंसिलर मुमताज़ जहां और उनके पति जावेद की जानिब से पटनासिटी स्थित मदरसा हुसैनिया,घसियारी गली में दावत दी गयी.मुमताज़ से पुरानी पहचान है,बहन और दोस्त दोनों है.गया मारूफगंज की हैं.तीन बार पटनासिटी से काउंसिलर रही हैं.अपने कार्यों के बूते.एक बार महज़ तीन वोट से डिप्टी मेयर का चुनाव हार गयीं.इस बार वार्ड काउंसिलर भी नहीं रहीं.उनके पति राजद में हैं.लोकप्रियता का कहना नहीं.शरीफ इंसान हैं.काम के धुनी.इलाक़े पर ज़बरदस्त पकड़.हिंदू-मुसलमान सब समान.दावत ए इफ़्तार में यह नज़ारा दिखा.भीड़ जैसे टूट पड़ी.जावेद भाई की दावत है तो जाना है.पूर्व विधायक इज़हार अहमद लग गए,चलना है.इस बार दावतें बहुत हो रही हैं.रमज़ान के तक़द्दुस का ख़्याल कम रखा जा रहा है.मगर यहां नेज़ाम और नज़ारा अलग था.इफ़्तार से पहले मौलाना शमीम अहमद मुनअमी साहब की तक़रीर चल रही है.रोज़ा क्यों रखते है?बहुत आसान लफ़्ज़ों में समझा रहे.ताकि भूख और प्यास महसूस कर सके और भूख-प्यास की हालत में भूखे और प्यासों का अहसास कर सके,उनकी जितनी हों मदद कर सकें.जानबूझ कर रोज़ा न रखने की सज़ा भी उन्होंने बतायी.एक रोज़ा के बदले लगातार साठ रोज़ा रखना है.अन्यथा साठ भूखों को खाना खिलाना है.मौलाना मित्तनघाट खानकाह के गद्दीनशीं हैं.बड़े इस्लामिक स्कॉलर हैं.चीजों को ढंग से प्रस्तुत करते हैं.आम उलेमा की तरह घिसापिटा अंदाज़ नहीं है इनका.बड़ी गहराई है मौलाना में.सत्ता से लेकर अवाम तक एहतेराम है.लोग इनकी क़द्र करते हैं.मिल्लत के लिए मयस्सर हैं मौलाना.

पूर्व मेयर अफज़ल इमाम,मौजूदा मेयर सीता साहू और मुमताज़ जहां

तक़रीर ख़त्म हुई.बीसों कार्यकता आगे आये,एक खजूर और एक बोतल पानी हाथ में थमा दिया.अज़ान होते ही खजूर और पानी से रोज़ा खोला गया.पहले मग़रिब की नमाज़ अदा की गयी.इसके बाद इफ़्तार का इंतज़ाम हुआ.इफ़्तार का यह बेहतर सिस्टम है.आम तौर पर इफ़्तार के चक्कर में नमाज़ में विलम्ब हो जाता है,खाने के चक्कर में कुछ लोग नमाज़ गोल ही कर जाते हैं.सियासी इफ़्तार पार्टियों में यह ख़ूब होता है.यहीं पटना के पूर्व मेयर अफज़ल इमाम से मुलाक़ात हो गयी.बेहतरीन इंसान.लबो लहजा,अंदाज़ ए गुफ़्तगू बेजोड़.सियासी-समाजी बारीकियों से वाक़िफ़.दो बार पटना का मेयर होना मामूली बात नहीं.इस बार भी मैदान में होंगे.जितने दिन मेयर पद पर रहे अफसरशाही को नकेल डाल कर रखा.अपनी शर्तों पर मेयर रहे.आज भी वही रुतबा.बहुत सारे लोग इनसे प्यार करते हैं.अफज़ल इमाम मेरे मित्र हैं,भाई जैसे.सबकी क़द्र करने वाले.जावेद भाई के यहां से निकल रहा था कि मौजूदा मेयर सीता साहू आ गयीं.इफ़्तार की महिमा यही है.हिन्दू-मुस्लिम एकता कितना सुहावना लगता है.हिंदुस्तान की ख़ूबसूरती यही है.कुछ बददिमाग़ लोग एकता में आग लगाना चाहते हैं.जो कभी नहीं होगा.गंगा जमनी संस्कृति की जड़ें बहुत मज़बूत हैं.

मौलाना शमीम अहमद मुनअमी तक़रीर करते

मुमताज़ के आसपास ही मासूमा ख़ातून रहती हैं.उर्दू-हिंदी की लेखिका और कवित्रि हैं.इज़हार भाई से ताल्लुकात है.थोड़ी देर वहां भी चले गए.शायरों की आदत के मुताबिक़ मासूमा ने दो-चार कलाम सुना डाली.उनकी आवाज़ सुरीली है.शिक्षिका भी हैं.मुमताज़ हों या मासूमा,मुस्लिम महिलायें हर क्षेत्र में छाप छोड़ रही हैं.मासूमा ने ज़बरदस्त लस्सी का नज़म रखा था.अब कुल्हड़ की लस्सी का चलन है.कुल्हड़ की चाय,कुल्हड़ की लस्सी की बात ही अलग है.बेजोड़,मज़ेदार.पहले चम्मच से मलाई,किशमिश खाइये,फिर पीजिए.वहां से निकले तो नुरानीबाग़ से इमरान का कॉल आ गया.यहां मुहल्ला के लड़कों ने सड़क पर ही सुंदर सजावट के साथ दावत ए इफ़्तार का आयोजन किया था.इफ़्तार का वक़्त ऐसा है कि एक वक़्त में एक ही जगह अटेंड कर सकते हैं.इस्लाम सिस्टम,ज़ाब्ता से चलता है.रोज़ा खोलने में न सेकंड की देर कर सकते न सेकंड पहले खोल सकते.यहां गुलफ़िशा उर्फ सुगन से मुलाक़ात हो गयी.अफज़ल भाई भी आ गए.आलमगंज उनका ही इलाक़ा है.वह बोले भी चलिये छोड़ देते हैं.मैं यहां मेज़बान हूं आप मेहमान.बहुत लोग थे.इफ़्तार से मौजूदा राजनीति तक बात चली.

रियाज़ अज़ीमाबादी की पत्नी से मुलाक़ात करते इज़हार अहमद,साथ में सुगन

राजद की शानदार इफ़्तार पार्टी का प्रबंधन अफज़ल इमाम के हाथ में ही था.उनकी देख रेख में आयोजन हुआ.राजद के सदस्य नहीं हैं अफज़ल इमाम,राजद के क़रीब हैं.लालू प्रसाद की विचारधारा से प्रभावित हैं.इस घराने से उनका मधुर और मज़बूत सम्बंध है.पारिवारिक.बात सुगन की.यह लेडी सामाजिक-राजनीतिक सूझबूझ वाली हैं.व्यावहारिक भी.इलाक़े में दबदबा है.लोकप्रिय भी.एक बार काउंसिलर रह चुकी हैं.इस बार चांस अधिक है.तैयारी चल रही है जीत की.सुगन बिहार राज्य हज कमिटी की सदस्य भी रही हैं.बहुत बोल्ड महिला हैं.मुसलमानों में सामाजिक सरोकार से जुड़ी महिला मिलती कहां हैं?आलमगंज में ही रियाज़ अज़ीमाबादी का घर है.बिहार के गम्भीर और नामचीन पत्रकारों में उनका शुमार रहा है.ब्लिट्ज़ से लेकर जागरण तक में उन्होंने सेवा दी.उर्दू-हिंदी के सहाफ़ी थे.सियासत का रुख़ और समाज का नब्ज टटोलने वाले.पिछले साल उनका निधन हो गया.मुझे मानते थे ,दिल से.इज़हार अहमद से गहरे रिश्ते थे.इज़हार भाई सियासतदां के अलावा एक सहाफ़ी भी हैं.शायद पहले सहाफ़ी,बाद में सियासतदां बने.प्यारी उर्दू के नाम से उनका अपना उर्दू अख़बार है.इज़हार भाई दो बार विधायक रहे.दो बार से नीतीश कुमार टिकट नहीं दे रहे.ताज्जुब है,ज़मीनी और मास नेता को टिकट देने में दुश्वारी क्या है?अब सियासत में लफ़ंगे ज़्यादा आ गए ,शरीफ लोगों की अब चलती नहीं.इज़हार भाई फिर भी लगे हुए हैं,जनता से उनका सम्पर्क पहले जैसा ही है.मिलने-जुलने के माहिर हैं.शादी-ब्याह,इफ़्तार,दुःख-सुख में हर जगह दिख जाते हैं.मरने के बाद कौन किसको याद करता है?मगर क़रीब आकर रियाज़ अज़ीमाबादी की विधवा से न मिलते यह कैसे होता,मचल गये.सुगन लेकर गयीं.रियाज़ साहब की पत्नी से मुलाक़ात हुई,शब ए क़द्र की तैयारी में लगी थीं.इज़हार भाई को देख कर गहरी सांस लीं,ख़ुश हुईं.पता चला वह शिक्षिका हैं.एक बेटा है,बाहर में है.रियाज़ साहब को याद कर आज मरती पत्रकारिता की रूह जाग रही है.सुगन ने पत्रकारिता के पचास साल पूरा करने पर रियाज़ अज़ीमाबादी के सम्मान में ज़ोरदार समारोह कराया था.सहाफ़ियों को सम्मान का सिलसिला बना रहना चाहिए.
मिलते हैं फिर अगले पड़ाव पर
शुक्रिया

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