नीतीश कुमार सधी चाल चल रहे हैं.संकेत भी देते जा रहे हैं.अणे मार्ग छोड़ कर सर्कुलर रोड जाना इत्तिफ़ाक़ नहीं है.संकेत साफ है मुख्यमंत्री पद छोड़ेंगे!

सेराज अनवर

नीतीश कुमार सधी चाल चल रहे हैं.संकेत भी देते जा रहे हैं.अणे मार्ग छोड़ कर सर्कुलर रोड जाना इत्तिफ़ाक़ नहीं है.संकेत साफ है मुख्यमंत्री पद छोड़ेंगे!इसको यूं समझे,हालिया विधान परिषद चुनाव में पराजित एक पूर्व विधान परिषद सदस्य सरकारी आवास छोड़ने की तैयारी में हैं,अभी से ही कहीं डेरा खोज रहे हैं.हालांकि,अभी उन्हें आवास ख़ाली करने को नहीं कहा गया है.मगर हर सम्मानित व्यक्ति फ़ज़ीहत से बचना चाहता है.बहरहाल,नीतीश कुमार का गेम प्लान क्या है?क्यों शाम में घोर विरोधी प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी की इफ़्तार पार्टी में जाते हैं और सुबह में भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले गृहमंत्री अमित शाह से मिलते हैं?देखा जाये तो दोनों रूटीन वर्क है.सियासत का हिस्सा है.

वाक़ई ऐसा है?
आज जदयू के किसी नेता से बात कीजिए दबी ज़बान से सभी भाजपा के भारी दबाव का इज़हार करते हैं.मुख्यमंत्री भी यह महसूस कर रहे हैं.अमित शाह भले कथित चाणक्य माने जाते हैं लेकिन यह जानना ज़रूरी है चाणक्य ने इसी बिहार,मगध की धरती पर जन्म लिया.नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के चाणक्य हैं.अपने सधे और सांकेतिक स्टेप से सबको उलझा कर रख दिया है.वह घर से निकलते नहीं कि लोग राजभवन की तरफ देखने लगते हैं.एक बार यह हो चुका है.जाना था हज भवन,चले गये थे राजभवन.हज भवन में हज यात्रियों की उड़ान का उद्घाटन करना था,राजभवन जा कर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा सौंप दिया था.राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ज़मानत मिलने के बाद जल्द ही बिहार आयेंगे.जुलाई में राष्ट्रपति का चुनाव होना है.असल इश्यू यह है.नीतीश की नज़र राष्ट्रपति पद पर है.उपराष्ट्रपति पद तो राजग ऐसे ही देने को तैयार है.जिच राष्ट्रपति पद पर है.राजद की इफ़्तार पार्टी में जाना दबाव की राजनीति है.मान जाइए ,अन्यथा विकल्प है हमारे पास.

विकल्प क्या है?
नीतीश विपक्ष की तरफ से भी उम्मीदवार हो सकते हैं.जिसकी सम्भावना ज़्यादा है.यह गेम एक रणनीति के तहत चल रहा है.भारत की राजनीति के बड़े रणनीतिकार माने जाने वाले प्रशांत किशोर इन दिनों कांग्रेस से सट गए हैं.सोनिया को बता रहे पार्टी में अब वह ही रूह फूंक सकते हैं.प्रेजनटेशन का दौर चल रहा है.प्रधानमंत्री पद चाहिए तो पहले राष्ट्रपति पद पर क़ाबिज़ होना होगा,इसमें यह भी शामिल है.पीके नीतीश कुमार के विश्वासपात्र हैं.राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की रणनीति से पहले अपना राष्ट्रपति की रणनीति भी शामिल है और पीके के लिए नीतीश से बेहतर इस पद के उम्मीदवार कौन हो सकता है?पीके कांग्रेस में नीतीश कुमार के लिए बैटिंग कर रहे हैं.नीतीश के नाम पर विपक्ष को एकसूत्र में बांधने की बात हुई तो यह हुनर उन्हें मालूम है.ममता से लेकर लालू तक सबको तैयार कर सकते हैं.ऐसे भी भाजपा के साथ रहते हुए नरेंद्र मोदी का सबसे बड़ा कोई कमपेटिटर है तो वह नीतीश कुमार ही हो सकते हैं.जब मोदी का राजग में महिमामंडन चल रहा था तो नीतीश कुमार ही वह आदमी थे जिसने दाग़दार को प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहिए,कह कर देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था.अभी हाल में बिहार विधान सभा के स्पीकर विजय सिन्हा को नीतीश कुमार ने जिस तरह सदन के अंदर लोकतंत्र और संविधान का पाठ पढ़ाया,उसे भाजपा कैसे भूल सकती है.नीतीश के समाजवादी तेवर से भाजपा घबराई रहती है.अन्यथा,राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नीतीश कुमार की बनाने में भाजपा हिचकती नहीं.भारतीय राजनीति में अक्सर राष्ट्रपति रबड़ स्टम्प माना जाता है.नीतीश रबड़ स्टम्प नहीं हो सकते भाजपा ख़ूब समझती है.नीतीश को राष्ट्रपति पद पर बैठाने का मतलब हर दम ख़तरे में रहना है.नीतीश द्वारा संघमुक्त भारत भी भाजपा के दिमाग़ में बैठा हुआ होगी ही.राष्ट्रपति के अधिकार संविधान से जुड़े हैं.कोई अपनी शक्ति का इस्तेमाल नहीं करता तो यह अलग बात है.राष्ट्रपति का चुनाव राजग के लिए इस बार आसान नहीं है.भाजपा को अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए कड़ा संघर्ष से गुज़रना होगा.एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ विपक्ष के पास राजग के मुक़ाबले 900 वोट अधिक है.इसीलिए ,नीतीश विपक्ष से भी दोस्ती गाढ़ रहे हैं.विपक्ष की ओर से उम्मीदवार बनना अधिक सुरक्षित है.राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के चुनाव में राजद की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है.इफ़्तार पार्टी में नीतीश की शिरकत को सम्बन्ध सुधार के रूप में भी देखा जा सकता है और नीतीश के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बनना राजद के लिए घाटे का सौदा नहीं है.नीतीश मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ते हैं तो तेजस्वी की ताजपोशी तय है.जब तक रणनीति फलीभूत नहीं हो जाती है तब तक नीतीश तेजस्वी और अमित शाह से मिलते-जुलते रहेंगे.कुल मामला यह है
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