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साल 1965 का भारत-पाकिस्तान सिर्फ सीमा पर लड़की गई एक जंग नहीं थी, बल्कि यह भारतीय सेना के अदम्य साहस, देशभक्ति और बलिदान की ऐसी थी कहानी, जो कभी इतिहास में युद्ध नहीं हो सकती। इसी युद्ध में अपने एक ऐसे लाल को जन्म दिया, जिसने दुश्मन के शक्तिशाली टैंकों के सामने बिना मोर्चा संभाले मौत के घाट उतार दिया और अपनी वीरता से पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। उनका नाम था—वीर अब्दुल हमीद।

राजनीति में सवाल छोटा हो सकता है, लेकिन उसके पीछे छिपी कहानी बहुत बड़ी होती है। पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के MLC चुनाव ने JDU के भीतर कुछ ऐसा ही सियासी मोड़ पैदा कर दिया है। जिस अनंत सिंह ने कभी नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया था, वही अनंत सिंह अब पार्टी की अहम बैठक में पहुंचे और बैठक खत्म होने के बाद मीडिया के सामने एक शब्द तक नहीं बोले। अब इसी खामोशी को लेकर पटना की सियासत में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

आठवीं पुण्यतिथि पर पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को देश नमन कर रहा है.राजधर्म के प्रति वह समर्पित ज़रूर थे लेकिन एक मौक़े पर वह इस जवाबदेही को नहीं निभा पाए?

“तिरंगा सिर्फ कपड़ा नहीं, करोड़ों सपनों की पहचान है, भारत की मिट्टी पर मर मिटना ही हमारी सबसे बड़ी शान है।”

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के छोटे से गांव धामूपुर में 1 जुलाई 1933 को जन्मे अब्दुल हमीद साधारण परिवार से थे। पिता मोहम्मद उस्मान दर्जी का काम करते थे।