जब पैटन टैंक गरजे, अब्दुल हमीद ने इतिहास रच दिया..!
Manthan Today••68 व्यूज़•3 मिनट पढ़ें
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के छोटे से गांव धामूपुर में 1 जुलाई 1933 को जन्मे अब्दुल हमीद साधारण परिवार से थे। पिता मोहम्मद उस्मान दर्जी का काम करते थे।
सितंबर 1965। भारत-पाकिस्तान युद्ध अपने सबसे उग्र दौर में था। पाकिस्तान को अपने अमेरिकी पैटन टैंकों पर इतना घमंड था कि उसे लगता था, भारतीय सेना उनके सामने ज्यादा देर टिक नहीं पाएगी। भारी-भरकम टैंकों की गर्जना के बीच दुश्मन को अपनी जीत तय नजर आ रही थी। लेकिन खेमकरण की धरती पर एक ऐसा भारतीय जवान खड़ा था, जिसके हौसले के सामने लोहे के पहाड़ भी छोटे पड़ गए। वह नाम था – कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के छोटे से गांव धामूपुर में 1 जुलाई 1933 को जन्मे अब्दुल हमीद साधारण परिवार से थे। पिता मोहम्मद उस्मान दर्जी का काम करते थे। घर में दौलत नहीं थी, लेकिन बेटे के दिल में देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा था। बचपन से ही उन्हें कुश्ती, लाठी और निशानेबाजी का शौक था। यही शौक आगे चलकर उन्हें भारतीय सेना की 4 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट तक ले गया।
1962 के भारत-चीन युद्ध में भी उन्होंने कठिन परिस्थितियों में सेवा की और बहादुरी के लिए सेना पदक से सम्मानित हुए। लेकिन किस्मत ने उनके लिए एक और बड़ी परीक्षा लिख रखी थी। 1965 की जंग में पाकिस्तान अपने आधुनिक पैटन टैंकों के साथ पंजाब के खेमकरण सेक्टर में बढ़ रहा था। सामने टनों वजनी टैंक थे और दूसरी ओर भारतीय सेना के सीमित संसाधन। इसी मोर्चे पर अब्दुल हमीद के पास सिर्फ एक जीप पर लगी 106 मिमी रिकॉयलेस गन थी, लेकिन उनका साहस किसी भी हथियार से कहीं बड़ा था।
उन्होंने गन्ने के खेतों को अपनी ढाल बनाया। दुश्मन के टैंकों की गतिविधियों पर नजर रखी और सही मौके का इंतजार किया। फिर अचानक उनकी गन गरजी और देखते ही देखते एक पैटन टैंक आग का गोला बन गया। इसके बाद उन्होंने लगातार अपनी पोजीशन बदलते हुए दुश्मन पर हमला जारी रखा। लोकप्रिय सैन्य विवरणों में उनके द्वारा कई पैटन टैंकों, अक्सर सात से आठ टैंकों तक, को नष्ट करने का उल्लेख मिलता है। संख्या चाहे जो भी रही हो, सच यही है कि उनकी वीरता ने दुश्मन के आत्मविश्वास को चकनाचूर कर दिया।
10 सितंबर 1965 को भी वह मोर्चे पर डटे रहे। दुश्मन के एक और टैंक को निशाना बनाते समय उन पर हमला हुआ। उन्होंने आखिरी सांस तक लड़ते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया। उनका शरीर भले ही रणभूमि में गिर गया, लेकिन उनका साहस अमर हो गया। गाजीपुर का वह बेटा सैनिक की तरह नहीं, बल्कि तिरंगे में लिपटकर घर लौटा और पूरे देश की आंखें नम हो गईं।
उनकी असाधारण वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया। आज भी जब वीरता, देशभक्ति और अदम्य साहस की बात होती है, तो अब्दुल हमीद का नाम सबसे आगे लिया जाता है। उन्होंने साबित कर दिया कि युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं जीते जाते, बल्कि जज्बे, रणनीति और मातृभूमि के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने के साहस से जीते जाते हैं। उनकी गाथा आने वाली हर पीढ़ी को यह संदेश देती रहेगी कि सच्चा वीर वही है, जो देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने से भी पीछे न हटे।