भारत ने क्या पाया, क्या खोया? आज़ादी की असली कीमत क्या है!
Manthan Today••56 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें
“तिरंगा सिर्फ कपड़ा नहीं, करोड़ों सपनों की पहचान है,
भारत की मिट्टी पर मर मिटना ही हमारी सबसे बड़ी शान है।”
PATNA
🖋️ GOVIND
15 अगस्त 1947 को जब गुलामी की जंजीरें टूटीं, तब भारत के सामने सवाल सिर्फ आजादी बचाने का नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र को खड़ा करने का था, जिसे सदियों की गुलामी ने भीतर तक कमजोर कर दिया था। आज 80वें स्वतंत्रता वर्ष में खड़ा भारत पीछे मुड़कर देखता है तो तस्वीर गर्व से सीना चौड़ा करने वाली भी है और कुछ सवालों पर सिर झुकाने वाली भी।
कभी अनाज के लिए दुनिया की ओर देखने वाला भारत आज खाद्य सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर है। हरित क्रांति ने खेतों में नई ताकत भरी, श्वेत क्रांति ने दूध उत्पादन में देश को दुनिया की अग्रिम पंक्ति में पहुंचाया। लेकिन इसी विकास की कीमत भी चुकाई गई। रासायनिक खेती ने मिट्टी की सेहत पर असर डाला, भूजल लगातार नीचे गया और किसान आज भी कर्ज, लागत और बाजार की मार से जूझ रहा है।
आज भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हुआ, उद्योग बढ़े और करोड़ों लोगों के हाथ में बैंक खाता और मोबाइल पहुंचा। यूपीआई ने पैसे के लेनदेन की तस्वीर ही बदल दी। आधार और सीधे खाते में सरकारी सहायता पहुंचने से बिचौलियों की भूमिका घटी। लेकिन दूसरी तस्वीर यह है कि विकास का लाभ हर जेब तक बराबर नहीं पहुंचा। अमीर और गरीब के बीच की दूरी अब भी चुभती है और रोजगार की रफ्तार करोड़ों युवाओं की उम्मीदों के बराबर नहीं पहुंच सकी है।
विज्ञान के मोर्चे पर भारत ने दुनिया को अपनी क्षमता दिखाई। इसरो के चंद्रयान और मंगलयान ने अंतरिक्ष में तिरंगा पहुंचाया। परमाणु शक्ति, मिसाइल तकनीक और स्वदेशी रक्षा उपकरणों ने देश को रणनीतिक मजबूती दी। लेकिन सवाल यह भी है कि अनुसंधान पर खर्च अभी क्यों कम है और हमारी प्रतिभाओं को बेहतर अवसरों के लिए विदेश क्यों जाना पड़ता है ? शिक्षा की तस्वीर में भी क्रांति हुई। आजादी के समय बेहद कम साक्षरता से शुरू हुआ सफर आज 77 प्रतिशत से अधिक साक्षरता तक पहुंच चुका है। आईआईटी, आईआईएम, एम्स, विश्वविद्यालयों और स्कूलों का विशाल नेटवर्क खड़ा हुआ। बेटियां शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ीं। फिर भी रटने की संस्कृति, महंगी निजी शिक्षा, कोचिंग का बढ़ता कारोबार और डिग्री तथा रोजगार के बीच की खाई अब भी बड़ी चुनौती है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में जीवन प्रत्याशा करीब दोगुनी हुई। चेचक और पोलियो जैसी बीमारियों पर ऐतिहासिक जीत मिली और भारत दुनिया के लिए दवाओं तथा टीकों का बड़ा केंद्र बना। मगर सरकारी अस्पतालों की गुणवत्ता, महंगा निजी इलाज और गांव-शहर के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं का अंतर आज भी सवाल खड़ा करता है। डिजिटल क्रांति ने भारत को नई रफ्तार दी। सस्ता इंटरनेट, करोड़ों इंटरनेट उपयोगकर्ता और दुनिया में सबसे बड़े वास्तविक समय डिजिटल भुगतान तंत्रों में यूपीआई की भूमिका ने भारत की पहचान बदली। लेकिन डिजिटल खाई, साइबर अपराध, ऑनलाइन ठगी और निजी डेटा की सुरक्षा नई चुनौतियां बनकर सामने आईं।
सबसे बड़ा सवाल समाज का है। अधिकार बढ़े, महिलाएं सेना, विज्ञान, राजनीति और उद्योग में आगे बढ़ीं, वंचित वर्गों को संवैधानिक सुरक्षा मिली। मगर तेजी से बदलती जिंदगी में संयुक्त परिवार, सामुदायिक जुड़ाव और मानवीय संवेदनाओं पर बाजारवाद का दबाव बढ़ा। शहर बढ़े, लेकिन जंगल घटे; इमारतें ऊंची हुईं, मगर हवा और पानी की चिंता भी गहरी हुई। और फिर वह जख्म, जिसे कोई आंकड़ा नहीं मिटा सकता—विभाजन। आजादी की सुबह लाखों लोगों के लिए विस्थापन, हिंसा और अपनों से बिछड़ने का दर्द लेकर आई थी। वह पीड़ा हमारी स्मृति का हिस्सा है।
इसलिए 80वें स्वतंत्रता वर्ष का उत्सव सिर्फ उपलब्धियों पर तालियां बजाने का अवसर नहीं, बल्कि खुद से सवाल पूछने का समय भी है। हमने बहुत कुछ पाया है, बहुत कुछ खोया भी है। अब असली चुनौती यह है कि भारत केवल बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसा महान राष्ट्र बने जहां विकास के साथ न्याय हो, तकनीक के साथ इंसानियत हो, शहरों के साथ प्रकृति बचे और हर नागरिक को सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिले।
इन 80 वर्षों में हमने इमारतें, सड़कें और तकनीक नहीं बनाई; हमने एक राष्ट्र की चेतना गढ़ी है। मगर रास्ता अभी पूरा नहीं हुआ। हमें ऐसी तरक्की चाहिए जिसमें किसान सुरक्षित हो, युवा रोजगार पाए, गरीब सम्मान से जिए, बेटी निर्भय पढ़े, नदी साफ बहे और जंगल सांस लेते रहें। आजादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि भूख, बेरोजगारी, भेदभाव, भ्रष्टाचार और अज्ञान से भी मुक्ति है। असली विजय तब होगी, जब भारत शक्तिशाली होने के साथ संवेदनशील भी होगा। यही अगले दशक की चुनौती है, यही करोड़ों भारतीयों का संकल्प और यही तिरंगे की सच्ची पुकार है।