‘जय जवान,जय किसान’ वाले शास्त्री की मौत का राज़ क्या था ?
Manthan Today
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कद छोटा था, आवाज शांत थी, पहनावा बेहद साधारण था… लेकिन जब देश की आन पर बात आई, तो इसी छोटे कद के प्रधानमंत्री ने ऐसा फैसला लिया कि पाकिस्तान को समझ आ गया कि सामने खड़ा आदमी कमजोर नहीं, बल्कि इरादों का पहाड़ है
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कद छोटा था, आवाज शांत थी, पहनावा बेहद साधारण था… लेकिन जब देश की आन पर बात आई, तो इसी छोटे कद के प्रधानमंत्री ने ऐसा फैसला लिया कि पाकिस्तान को समझ आ गया कि सामने खड़ा आदमी कमजोर नहीं, बल्कि इरादों का पहाड़ है। यही थे लाल बहादुर शास्त्री—वही नाम, जिसे बचपन में आपने शायद पहली बार ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे के साथ सुना होगा। 2 अक्टूबर 1904 को मुगलसराय में जन्मे शास्त्री जी का बचपन किसी राजसी सुविधा में नहीं, बल्कि अभावों के बीच बीता। उनके पिता का निधन तब हो गया था, जब वे महज डेढ़ साल के थे। गरीबी इतनी थी कि स्कूल जाने के लिए कई बार नंगे पैर लंबा रास्ता तय करना पड़ता था। यही संघर्ष आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत बना।
आजादी की लड़ाई में कूदे तो अंग्रेजों की जेल भी देखी और करीब सात साल कारावास में बिताए। आजादी के बाद उन्होंने सत्ता को सुविधा नहीं, जिम्मेदारी माना। रेल मंत्री रहते हुए एक बड़ी रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, उनके इस कदम ने सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की मिसाल कायम की। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद 9 जून 1964 को लाल बहादुर शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने। उनका कार्यकाल भले ही करीब डेढ़ साल का रहा, लेकिन इसी छोटे से दौर में उन्होंने भारतीय राजनीति पर गहरी छाप छोड़ दी।
फिर आया 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध। देश एक तरफ युद्ध लड़ रहा था और दूसरी तरफ खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। ऐसे मुश्किल समय में शास्त्री जी ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की। खास बात यह थी कि उन्होंने केवल भाषण नहीं दिया, बल्कि पहले अपने घर में इसका पालन कराया। यानी देश से जो कहा, उसकी शुरुआत अपने परिवार से की। युद्ध के दौरान उनका दिया संदेश—‘जय जवान, जय किसान’—देश के सैनिक और किसान, दोनों को राष्ट्रीय शक्ति के केंद्र में ले आया। सरकारी स्रोतों के अनुसार, उन्होंने युद्ध के कठिन दौर में देश का नेतृत्व किया और 1965 के युद्ध में भारत को विजय तक पहुंचाया।
इसके बाद शांति की बारी आई। भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद में बातचीत हुई और 10 जनवरी 1966 को समझौते पर हस्ताक्षर हुए। लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद 11 जनवरी की सुबह शास्त्री जी का ताशकंद में निधन हो गया। उनकी मृत्यु को लेकर वर्षों से सवाल और अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं, जबकि आधिकारिक रिकॉर्ड उनके ताशकंद में अचानक निधन की पुष्टि करता है। सबसे चौंकाने वाली बात शायद यह है कि जिस व्यक्ति ने देश की सबसे बड़ी कुर्सी संभाली, उसकी निजी जिंदगी में दिखावा लगभग नहीं था। उनकी सादगी की चर्चा आज भी होती है। प्रधानमंत्री कार्यालय उन्हें ईमानदारी, विनम्रता और मजबूत आंतरिक संकल्प वाला नेता बताता है।
उनकी जयंती पर सवाल सिर्फ इतना नहीं कि शास्त्री जी कौन थे। असली सवाल यह है कि आज जब राजनीति में बड़े-बड़े दावे सुनाई देते हैं, तब उस छोटे कद के प्रधानमंत्री की वह सादगी, जवाबदेही और दृढ़ता हमें कितनी याद है ? क्योंकि, शास्त्री जी की कहानी सिर्फ एक प्रधानमंत्री की कहानी नहीं… यह उस भारत की कहानी है, जहां पद बड़ा नहीं था, चरित्र बड़ा था।