सुप्रीम कोर्ट ने Form-6 को मंजूरी नहीं दी तो चुनाव आयोग ने किस आधार पर देश के मतदाताओं से खिलवाड़ किया :इन्तेखाब आलम
Manthan Today
••18 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें
यह कोई मामूली प्रशासनिक गलती नहीं है। मतदाता सूची में नाम जोड़ना या हटाना सीधे नागरिक के संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा प्रश्न है
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य एवं एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया इन्तेखाब आलम ने Special Intensive Revision (SIR) को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है।
इन्तेखाब आलम ने कहा कि आज सुप्रीम कोर्ट में जो स्थिति स्पष्ट हुई है, उसने चुनाव आयोग के उस दावे पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, जिसमें आयोग ने Form-6 में जोड़े गए अतिरिक्त घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट के आदेश से स्वीकृत बताया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा कि संशोधित Form-6 को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है और रिकॉर्ड सामने आने पर कोर्ट यह देखना चाहता है कि आखिर “किसने क्या संशोधित किया।”
उन्होंने कहा कि यह कोई मामूली प्रशासनिक गलती नहीं है। मतदाता सूची में नाम जोड़ना या हटाना सीधे नागरिक के संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। जब देश में SIR की प्रक्रिया के तहत करोड़ों मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर किए गए हैं और उसी प्रक्रिया में नए मतदाताओं के लिए Form-6 में अतिरिक्त शर्तें जोड़ी गईं, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह अधिकार किसने दिया और किस वैधानिक प्रक्रिया के तहत दिया गया।
आलम ने कहा कि चुनाव आयोग अब यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि Form-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया, बल्कि केवल अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। यदि किसी वैधानिक फॉर्म के साथ ऐसी नई शर्त जोड़ी जाती है जिसका असर किसी नागरिक के मतदाता बनने या मतदाता सूची में वापस आने के अधिकार पर पड़ता है, तो उसे केवल शब्दों का खेल बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने अब इस पूरे मामले का रिकॉर्ड देखने की बात कही है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने यदि वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश को अपने कदम का आधार बताया था, तो अब उसे देश के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-सा आदेश, किस तारीख का आदेश और किस पंक्ति में सुप्रीम कोर्ट ने Form-6 में इस अतिरिक्त शर्त को मंजूरी दी थी। क्योंकि आज मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी के बाद यह दावा गंभीर जांच के दायरे में आ गया है। इन्तेखाब आलम ने कहा कि लोकतंत्र में चुनाव आयोग केवल एक सरकारी कार्यालय नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव और मतदाता के अधिकारों का संवैधानिक प्रहरी है। यदि उसी संस्था की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट में यह सवाल उठे कि Form-6 में बदलाव किसने किया और उसकी अदालत से कोई मंजूरी नहीं थी, तो यह पूरे चुनावी तंत्र की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।
उन्होंने कहा कि SIR के नाम पर 13 करोड़ से अधिक नामों का ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर होना अपने आप में अत्यंत गंभीर विषय है। चुनाव आयोग का यह कहना कि इनमें मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या डुप्लीकेट मतदाता शामिल हैं, अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता; हर वास्तविक मतदाता को अपना नाम बचाने और अपनी नागरिकता तथा मतदान के अधिकार की रक्षा करने का सरल, निष्पक्ष और पारदर्शी अवसर मिलना चाहिए। आलम ने कहा कि किसी लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, चुनाव आयोग की संवैधानिक विश्वसनीयता स्थायी होनी चाहिए। इसलिए केंद्र सरकार को भी इस पूरे विवाद पर चुप्पी तोड़नी चाहिए और चुनाव आयोग को देश के सामने जवाब देना चाहिए कि SIR की प्रक्रिया में करोड़ों नामों को बाहर करने, Form-6 में अतिरिक्त शर्त जोड़ने और उसके लिए सुप्रीम कोर्ट की कथित मंजूरी का हवाला देने की पूरी प्रक्रिया किसके निर्देश पर हुई।
उन्होंने कहा, “वोट किसी सरकार की मेहरबानी नहीं है। वोट भारत के संविधान ने नागरिक को दिया हुआ लोकतांत्रिक अधिकार है। अगर एक भी पात्र नागरिक का वोट प्रशासनिक प्रक्रिया, तकनीकी गलती या मनमानी के कारण छिनता है तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए—और जब सवाल करोड़ों मतदाताओं का हो, तो जवाबदेही और भी बड़ी हो जाती है।”
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य के रूप में मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं कि कांग्रेस हर पात्र भारतीय के मताधिकार की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक लड़ाई पूरी मजबूती से लड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट ने आज जो सवाल उठाया है, वह केवल Form-6 का सवाल नहीं है; यह सवाल है कि भारत में मतदाता सूची कौन बनाएगा—कानून और संविधान के अनुसार संस्थाएं या मनमाने प्रशासनिक फैसले।
उन्होंने कहा कि अब देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत होने वाले रिकॉर्ड पर हैं। देश जानना चाहता है—Form-6 किसने बदला, किस अधिकार से बदला और फिर उस बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी का दावा किस आधार पर किया गया?