राष्ट्रीय जनता दल में पार्टी के मुस्लिम नेताओं की कोई अधिक अहमियत रह नहीं गयी है.अधिक्तर लोग घुटन महसूस करते मिल जाते हैं.ऐसे नेताओं के लिए ओवैसी की पार्टी नेमत के बतौर है.

सेराज अनवर

PATNA:भारतीय जनता पार्टी की जीत के लिए असद उद्दीन ओवैसी को चाहे आप जितना गरियायें,मगर उन्हें झुक कर जितना सलाम करें कम है.यह कटु सत्य है कि तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय जनता दल में पार्टी के मुस्लिम नेताओं की कोई अधिक अहमियत रह नहीं गयी है.अधिक्तर लोग घुटन महसूस करते मिल जाते हैं.ऐसे नेताओं के लिए ओवैसी की पार्टी नेमत के बतौर है.कथित धर्मनिरपेक्ष दलों पर एक दबाव बनाये हुए है.

तेजस्वी यादव

हार से राजद अभी बैकफ़ुट पर

सोचिये!गोपालगंज से राजद जीत जाता,पार्टी के मुस्लिम नेताओं की क्या अहमियत रह जाती?सीवान के दिवंगत सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन परिवार को चुनाव के दौरान पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया था.पोस्टर में शहाबुद्दीन या हिना शहाब का नाम तक देना ज़रूरी नहीं समझा गया.हिना पार्टी से नाराज़ चल रही हैं.कहते हैं कि एआइएमआइएम को उतना मिले वोट में शहाबुद्दीन समर्थकों का योगदान है.यदि राजद प्रत्याशी मोहन गुप्ता जीत जाते तब क्या होता?तेजस्वी को ज़ोम(ग़रूर)हो जाता कि मुस्लिम नेताओं के सहयोग लिए बिना जीत कर दिखा दिया.ग़ौरतलब है कि गोपालगंज विधानसभा के उपचुनाव में तेजस्वी के साथ मुस्लिम नेता नहीं देखे गये,कह सकते हैं कि उन्हें तरजीह नहीं दी गयी.स्थानीय तौर पर पूर्व विधायक रियाज़ुल हक़ राजू लगे थे.इस सीट पर उनकी ही दावेदारी रही है.मुसलमान को नज़रअंदाज़ कर माय समीकरण वाली पार्टी ने गुप्ता जी को उतार दिया.चर्चा तो यह भी है कि इस हार से रियाज़ुल भी राहत महसूस कर रहे.हार से राजद अभी बैकफ़ुट पर है.पार्टी में मुसलमानों को लेकर आत्ममंथन चल रहा है.

हिना शहाब

मुस्लिम नेताओं को मिली संजीवनी

भारी तोड़फोड़ के बावजूद एआइएमआइएम के उदय से राजद के मुस्लिम नेताओं को संजीवनी मिल गयी है.इसका तात्कालिक लाभ अब्दुल बारी सिद्दीक़ी को मिलने की चर्चा है.अब उन्हें जगदानंद सिंह की जगह प्रदेश राजद की कमान सौंपी जा सकती है.बेटे सुधाकर सिंह को मंत्रीमंडल से ड्रॉप किए जाने के बाद से प्रदेश अध्यक्ष पार्टी से रूठे चल रहे हैं.डेढ़ दो महीने से वह पार्टी दफ़्तर नहीं आये हैं.उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.अब उनका इस्तीफ़ा मंज़ूर कर लिया जायेगा.गोपालगंज चुनाव को लेकर उनका इस्तीफ़ा ठंडे बसते में पड़ा था.क्योंकि,भाजपा की प्रत्याशी राजपूत जाति से थी.चुनाव के दौरान जगदानंद सिंह को चलता कर देने से उनकी जाति के बिदकने का ख़तरा था.गोपालगंज की हार से हीना शहाब को भी लाभ मिलने जा रहा है.अब उनकी पार्टी में पूछ बढ़ेगी.पार्टी से नाता तोड़ लेने के बावजूद हीना शहाब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बनी हुई हैं.हालांकि,हीना शहाब दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुईं थीं. दिलचस्प बात यह है कि बग़ावत पर उतरींहीना शहाब पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने से पार्टी हिचक रही है.जिससे सीवान की ताक़त का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है.गोपालगंज की हार ने पांसा पलट कर रख दिया है.

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