सेराज अनवर/पटना

एक पत्रकार के रूप में हमारे उनसे रिश्ते थोड़े तीखे थे.मगर काफी रफ़टफ थे.कभी झिड़की वह पिलाते,कभी हम भी कुछ कह जाते.मगर उन्होंने मेरी पत्रकारिता की कभी आलोचना नहीं की,क़द्र करते थे.वह बड़े प्यार से कहते थे,आप से बात नहीं होगी.जितनी बदतमीजिया होती हैं,आप करते हैं.


मोहम्मद शहाबुद्दीन साहब की आज पहली बरसी है.लोग उन्हें साहेब के नाम से जानते थे.मैं शहाब भाई ही कहता रहा.2003 में शायद उनसे आख़री मुलाक़ात हुई थी.सीवान में समर्पण के वक़्त.एक पत्रकार के रूप में हमारे उनसे रिश्ते थोड़े तीखे थे.मगर काफी रफ़टफ थे.कभी झिड़की वह पिलाते,कभी हम भी कुछ कह जाते.मगर उन्होंने मेरी पत्रकारिता की कभी आलोचना नहीं की,क़द्र करते थे.वह बड़े प्यार से कहते थे,आप से बात नहीं होगी.जितनी बदतमीजिया होती हैं,आप करते हैं.मगर बात हमसे ही करते थे.बिहार में मैं इकलौता पत्रकार रहा हूंगा जिससे वह खुल कर बात करते थे.उनकी ज़बान,लहजा बहुत ख़ूबसूरत था.मीडिया से उनका ज़्यादा मतलब था नहीं.वह कहते सेराज साहब आप तो जानते हैं मीडिया में मैं रहता नहीं और यह सही भी था.मीडिया और माले ने उन्हें डॉन बना दिया.उनकी मौत पर कुछ मीडिया घरानों में जश्न भी मना और बाद में माले भी उनकी चौखट पर झुक गया.

सीवान के सांसद रहे मोहम्मद शहाबुद्दीन के एक पक्ष को मीडिया ने हमेशा उछाला.बाहुबली,दबंग,अंडरवर्ल्ड,आतंकवादी के ख़िताब से नवाज़ा.चूंकी शहाबुद्दीन मुसलमान थे.सब पर भारी थे.उनके ही दौर में पप्पू यादव सूरजभान सिंह,राजन तिवारी,धूमल सिंह,रामा सिंह ,सुनील पांडेय आदि भी दूध के धुले नहीं थे.मगर निशाने पर एकमात्र शहाबुद्दीन थे.जबकि शहाबुद्दीन साहब ने मुसलमानों की कभी राजनीति नहीं की.वह कयादत की जगह सियासत शब्द का इस्तेमाल करते थे.एक बार हमने लिखा था,मोहम्मद शहाबुद्दीन राजद में इकलौते मुस्लिम नेता हैं जो लालू प्रसाद की आंख में आंख डाल कर बात कर सकते हैं.मगर इन्हें मुस्लिम राजनीति से अधिक अपराध की राजनीति पसंद है.इसी बात को लेकर हम पर गरमा गये थे.उसी समय बोला था जितनी बदतमीजियां हैं करते हैं.उनके शब्दों में मेरी बदतमीजियां चलती रहीं और उनकी डांट-फटकार भी.शहाबुद्दीन कोई मुस्लिम नेता नहीं थे.सच्चे-पक्के मुसलमान थे.सवर्ण हिंदुओं के नेता थे.माले का उभार हो रहा था. सवर्ण हिंदू भयभीत थे.अपनी सुरक्षा के लिए शहाबुद्दीन की छत्रछाया में गए.तब शहाबुद्दीन उनके लिए बहुत अच्छे थे?यादव मजबूरी में साथ रहा.कभी दिल से शहाबुद्दीन साहब का साथ नहीं दिया.साथ न देते तो चुनाव में धूल फ़ांक जाते.अवध बिहारी चौधरी से लेकर अन्य यादव नेता डींग भले हांकते रहे हों ,ज़मीन किसी की नहीं थी.आज माले को भी समझ आ गयी कि शहाबुद्दीन घराना के सहयोग के बिना सियासत आसान नहीं है.

शाहबुद्दीन रॉबिनहूड छवि के थे.शान से जीने वाले,किसी के आगे नहीं झुकने वाले.वह कहते मैं सिर्फ़ अल्लाह से डरता हूं बाक़ी किसी से नहीं.बेबाक थे,निडर थे.लालू प्रसाद को यह बात चुभती थी.सत्ता पक्ष को उनका राजनीतिक रुतबा नागवार गुजरता था.परस्तिथियों का मुख्यमंत्री कह देना कोई बड़ी बात नहीं थी.आज सहयोगी दल हर दिन यह बात कह रहा है.शासक वर्ग यह कैसे बर्दाश्त करता.तेरह वर्ष के बाद जेल से रिहा होने के बाद उन्हें तिहाड़ भेजवा दिया और फिर उनकी मौत हो गयी.आज ही के दिन.वह पक्के नमाज़ी थे.वह शराबी-शबाबी नहीं थे,यह उनकी ख़ासियत थी.पेशंस ज़बरदस्त था.एक बार सीवान स्थित उनके यूनानी कॉलेज में छात्रायें आपस में लड़ गयीं.शाहबुद्दीन साहब पटना में थे.अपने रिश्तेदार पूर्व मंत्री एजाजुल हक़ के आवास पर.सुबह के आठ बज रहे होंगे.शहाबुद्दीन साहब स्नान करने जा रहे थे कि एक छात्रा का फोन आ गया.उन्होंने कहा कि अभी छात्रावास में रहो,हम आते हैं तो देखते हैं.वह वहां रहने को तैयार नहीं.समझाते-समझाते डेढ़ दो घंटा हो गया मुझे लगा कि अब दो चार गाली सुन जायेगी.मगर कनविंस करके ही दम लिए फिर नहाने गए. मेरे मुंह से निकला ग़ज़ब का पैसंश है इस आदमी में.शहाबुद्दीन साहब एक और वजह से चुभते थे.सीवान में कई एकड़ में शैक्षणिक संस्थान खोलने की तैयारी कर रहे थे.एक ही जगह पर मेडिकल,इंजीनियरिंग आदि.काम चल रहा था.आपराधिक छवि स्थापित कर चुके पक्ष-विपक्ष को यह कैसे बर्दाश्त होता कि वह शिक्षाविद कहलाते.वैसे वह पहले से डॉ.मोहम्मद शहाबुद्दीन थे.अपने सांसद निधी का उन्होंने पाई-पाई पैसा खर्च किया.शायद देश में इकलौते सांसद थे.बेस्ट पार्लमेंटेरियन का अवार्ड भी मिला.सीवान में डॉक्टरों की फ़ीस तय की.उनके दूसरे पक्ष की सराहना किसी ने नहीं की.आज के दौर में शहाबुद्दीन होना बहुत कठिन काम है.कठिनाइयों में भी उस शख़्स ने समझौता नहीं किया.जदयू की बड़ी कोशिश रही लालू से शहाबुद्दीन को तोड़ दिया जाये.कांग्रेस भी डोरे डालती रही मगर मरते दम तक शहाबुद्दीन लालू के साथ रहे और राजद ने उनके साथ क्या किया?शहाबुद्दीन के बेग़ैर राजद और सीवान अधूरा है,जैसा मैंने शहाबुद्दीन साहब को जाना-समझा. . . फिर कभी

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