आज राष्ट्र महात्मा गांधी का 152 वीं जयंती मना रहा है.मगर कभी आपने सोचा है यदि बतख़ मियां न होते तो न गांधी होते और न भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वैसा होता जैसा हम जानते हैं.गांधी के जीवन में उन्हें मारने के लिए छह बड़े प्रयास हुए थे.छठवीं बार गांधी के हत्यारे सफल हो गए.इसके अलावा दो प्रयास 1917 में बिहार के चंपारण में हुए.इन्हीं में से एक कोशिश को बतख मियां ने नाकाम कर दिया था.लेकिन बतख़ मियां की देशभक्ति की यह दास्तान गुमनामी के पर्दे में दबी रह गई.

सेराज अनवर/पटना

आज राष्ट्र महात्मा गांधी का 152 वीं जयंती मना रहा है.मगर कभी आपने सोचा है यदि बतख़ मियां न होते तो न गांधी होते और न भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वैसा होता जैसा हम जानते हैं.गांधी के जीवन में उन्हें मारने के लिए छह बड़े प्रयास हुए थे.छठवीं बार गांधी के हत्यारे सफल हो गए.इसके अलावा दो प्रयास 1917 में बिहार के चंपारण में हुए.इन्हीं में से एक कोशिश को बतख मियां ने नाकाम कर दिया था.लेकिन बतख़ मियां की देशभक्ति की यह दास्तान गुमनामी के पर्दे में दबी रह गई.इतिहास ने बतख मियां को भुला दिया.एक सवाल अक्सर दिमाग़ को परेशान करता है जब यह घटना हुई,देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कई लोग इसके गवाह बने.ये क़िस्सा महात्मा गांधी की जीवनी में कहीं नहीं है. चंपारण का सबसे प्रामाणिक इतिहास मानी जाने वाली राजेंद्र प्रसाद की किताब में इसका ज़िक्र नहीं है.जबकि 1957 में राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद मोतिहारी गए.वे वहां एक सभा को संबोधित कर रहे थे तभी उन्हें लगा कि सामने भीड़ में एक व्यक्ति आगे आने के लिए संघर्ष कर रहा है और वे उसे जानते हैं.उन्होंने उस व्यक्ति को आवाज दी- बतख़ भाई, कैसे हो? उन्होंने बतख़ मियां को मंच पर बुलाया,गले लगाया और जनसभा में मौजूद लोगों को गांधी की हत्या की साजिश नाकाम करने का किस्सा सुनाया.साथ में राष्ट्रपति भवन ने बिहार सरकार को एक ख़त लिखा कि चूंकि उनकी ज़मीनें चली गई हैं, तो उन्हें 35 एकड़ ज़मीन मुहैया कराई जाए.बतख़ मियां की लाख भागदौड़ के बावजूद प्रशासनिक सुस्ती के कारण वह जमीन उन्हें नहीं मिल सकी.निर्धनता की हालत में ही 1957 में उन्होंने दम तोड़ दिया.

राष्ट्रपति भवन की चिट्ठी

चंपारण सत्याग्रह और गांधी

चंपारण सत्याग्रह गांधी के राजनीतिक जीवन और देश के आजादी आंदोलन का अहम पड़ाव है.यही वह आंदोलन था जहां से एक बड़े नेता के रूप में गांधी की पहचान और प्रतिष्ठा बन रही थी.इसी आंदोलन के क्रम में गांधी मोतिहारी में थे. बिहार में नील के किसान शोषण और लूट से परेशान थे.गांधी जी इन किसानों के लिए आंदोलन चला रहे थे.यह गांधी के राजनीतिक जीवन का शुरुआती दौर था.बात 1917 की है जब साउथ अफ़्रीक़ा से लौटने के बाद स्वतंत्रता सेनानी शेख़ गुलाब, शीतल राय और राजकुमार शुक्ल के आमंत्रण पर गांधीजी मौलाना मज़हरुल हक़, डॉ राजेन्द्र प्रसाद और अन्य लोगों के साथ अंग्रेजों के हाथों नीलहे किसानों की दुर्दशा का ज़ायज़ा लेने चंपारण के ज़िला मुख्यालय मोतिहारी आए थे.

चिराग़ अली अंसारी

गांधी को मारने की योजना

वार्ता के उद्देश्य से नील के खेतों के तत्कालीन अंग्रेज मैनेजर इरविन ने उन्हें रात्रि भोज पर आमंत्रित किया.तब बतख़ मियां अंसारी इरविन के रसोइया हुआ करते थे.इरविन का प्लान था कि गांधी को खाने में कोई ऐसा जहर दिया जाए जो कुछ देर से असर करे,ताकि गांधी वहां से चले जाएं तब उनकी मौत हो.इससे गांधी की हत्या का इल्जाम उसके सिर नहीं आएगा.इरविन की योजना थी कि अगर यह आदमी मर जाएगा तो अंग्रेजों की राह आसान हो जाएगी.इरविन ने बतख मियां अंसारी को पूरी योजना समझाई और उनसे कहा गया कि तुम दूध का गिलास लेकर गांधी के पास जाओगे. बतख मियां को इसके लिए लालच भी दिया गया और धमकी भी.बतख़ मियां गरीब आदमी थे.उनका छोटा सा परिवार था.वे इरविन के यहां नौकरी करके अपना परिवार पालते थे.बतख मियां मालिक का आदेश मानने से इनकार नहीं कर पाए.जब गांधी आए तो बतख मियां दूध का गिलास ले कर पहुंचे लेकिन जब बतख मियां गांधी के पास पहुंचे तो यह गुनाह करने की उनकी हिम्मत नहीं हुई .गांधी ने उन्हें सिर उठाकर देखा तो बतख़ मियां रोने लगे, उन्होंने गिलास ज़मीन पर उलट दिया और एक बिल्ली उसे चाटकर मौत की नींद सो गई.

बतख़ मियां का मज़ार

बतख़ मियां को अंग्रेजों ने बर्बाद कर दिया

अंग्रेज बहादुर को यह बात कैसे बर्दाश्त होती. बतख मियां को जेल में डाल दिया गया.उनका घर ध्वस्त करके वहां पर कब्रिस्तान बना दिया गया. उनकी थोड़ी सी जमीन को नीलाम कर दिया गया. उनके परिवार पर जुल्म हुआ और परिवार बर्बाद हो गया. बतख मियां ने गांधी को बचाने की भारी कीमत चुकाई.बतख मियां गरीब आदमी थे लेकिन माफी मांगने की जगह 17 साल की जिंदगी जेल में बिताई.1917 में बतख मियां ने गांधी को बचा लिया था,1948 में गोडसे ने उनकी हत्या कर दी.

बतख़ मियां का परिवार

मज़दूरी कर जीवन-यापन कर रहा परिवार

बतख मियां के दो पड़पोते असलम अंसारी और ज़ाहिद अंसारी अभी दैनिक मज़दूरी करके जीवन-यापन कर रहे हैं.कोई ड्राईवरी कर गुज़ारा करता है तो कोई खेत में मज़दूरी.इनमें एक अन्य पड़पोते चिराग़ अली अंसारी ही थोड़ी-बहुत बेहतर स्तिथि में हैं.इनका फल-फ़्रूट की दुकान हैं.परदादा बतख़ मियां को राष्ट्रीय पहचान और सही मुक़ाम दिलाने की लड़ाई चिराग़ ही लड़ते रहे हैं.चिराग़ उत्तरप्रदेश के डॉ.अयूब की पीस पार्टी से जुड़े हैं.राजनीतिक समझ रखते हैं.चिराग़ बताते हैं कि डॉ.राजेंद्र प्रसाद सहित पांच-पांच राष्ट्रपति के आर नारायनण,एपीजे अब्दुल कलाम,प्रतिभा पाटिल,प्रणब मुखर्जी की सिफ़ारिश के बावजूद उनके परिवार को 35 एकड़ भूमि अब तक नहीं मिल पायी है.इसके लिए परिवार ने धरना-प्रदर्शन भी किया था.बतख़ मियां के तीन बेटे थे.रशीद मियां,शेर मोहम्मद मियां और जान मोहम्मद अंसारी.अब दुनिया में कोई नहीं हैं.बतख़ मियां की अभी पांचवीं पीढ़ी चल रही है.चिराग़ के अनुसार तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने 1975 में परिवार को पांच बीघा ज़मीन मुहैया करायी थी.वो बताते हैं कि जिला प्रशासन की लापरवाही से बतख़ मियां का परिवार आज सड़क पर है.दौड़ते-दौड़ते हम थक चुके हैं.राष्ट्रपति तक के आदेश का पालन नहीं हो रहा है.मेरे परदादा इतनी बड़ी क़ुर्बानी नहीं देते तो आज देश का इतिहास कुछ अलग होता.अंसारी महापंचायत के संयोजक वसीम नैयर अंसारी बतख़ मियां को भारतरत्न देने की मांग करते हैं.वह कहते हैं कि बतख़ मियां के बिना देश की आज़ादी अधूरी है.चंपारन शताब्दी समारोह में राजकीय सम्मान नहीं मिलना अफसोसनाक है.वसीम कहते हैं कि चंपारन स्टेशन,नॉर्थ बिहार सेंट्रल यूनिवर्सिटी का नाम बतख़ मियां के नाम पर होना चाहिए.गांधी की जान बचाने वाली शख़्सियत को उचित सम्मान देने की जरूरत है.

जर्जर पुस्तकालय एवं संग्रहालय

बतख़ मियां संग्रहालय में रखा जा रहा EVM

1990 में,राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने पहली बार इस पूरे प्रकरण को उजागर किया और प्रमाण सहित बतख मियां के वंशजों को न्याय दिलाने की कारगर पहल की। तब कहीं मीडिया का ध्यान इस ओर गया और देश-भर के समाचार-माध्यमों में उनका नाम उछला.बाद में, विधान परिषद् के प्रभावकारी हस्तक्षेप से बतख मियां के गांव में उनका स्मारक बना तथा उनकी याद में ज़िला मुख्यालय में ‘संग्रहालय‘ का निर्माण किया गया तथा कुछ ज़मीन के साथ ही तमाम वायदे किये गए जो अभी पूरे होने बाक़ी हैं.उनके नाम पर स्थापित ‘संग्रहालय‘ पर अर्द्ध-सैनिक बलों का कब्जा रहा है.अर्द्ध-सैनिक बलों ने संग्रहालय ख़ाली कर दिया है मगर 2019 से इसमें ईवीएम रखा जा रहा है.2004 में निर्मित बतख़ मियां पुस्तकालय -संग्रहालय अभी तक चालू नहीं हो सका है.

बतख मियां नामक एक खानसामा ने अपनी जान जोखिम में डाल कर बापू को बचा लिया.यह ऐतिहासिक प्रकरण इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया। इतिहासकारों से लेकर चंपारण की गाथा सुनाने वालों को भी यह नाम मुश्किल से याद रहता है.अंग्रेजों का इरादा एक मुस्लिम ख़ानसामा को मोहरा बनाकर पूरे देश को साम्प्रदायिक दंगों की भट्ठी में झोंक देने की थी.हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक सच्चे राष्ट्रभक्त बतख़ मियां को समय मंथन का लाखों सलाम

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