इमारत ए शरिया तीन राज्यों बिहार-झारखंड-ओड़िसा के मुसलमानों की सबसे बड़ी प्रतिनिधित्व संस्था है.इमारत के एलान के बाद ही इस मसलक के लोग ईद मनाते हैं.यह सिर्फ मज़हबी इदारा नहीं है.देश भर के मुसलमानों की सियासी और सामाजिक रहनुमाई भी करता है.

मदाख़लत/सेराज अनवर

इमारत ए शरिया तीन राज्यों बिहार-झारखंड-ओड़िसा के मुसलमानों की सबसे बड़ा प्रतिनिधित्व संस्था है.इमारत के एलान के बाद ही इस मसलक के लोग ईद मनाते हैं.यह सिर्फ मज़हबी इदारा नहीं है.देश भर के मुसलमानों की सियासी और सामाजिक रहनुमाई भी करता है.समुदाय को इस पर मुकम्मल एत्तेमाद है.गुज़िशता महीने 26 जून को इमारत ने अपने स्थापना का 100 साल पूरा किया है.अभी इमारत का शताब्दी वर्ष चल रहा है.किसी संस्था केलिये सफलतापूर्वक सौ साल का सफर मायने रखता है.यह भरोसे की मज़बूत बुनियाद पर ही संभव है.मगर जश्न के इस फिज़ा में इमारत से सूचनायें अच्छी नहीं आ रही हैं.इमारत को इस बुलंदी पर पहुंचाने वाली वली सिफत शख़्सियत मौलाना मोहम्मद वली रहमानी के गुज़र जाने के बाद अमीर ए शरीयत का पद रिक्त है.

अबतक इमारत के जो भी अमीर ए शरीयत हुए उन्होंने अपना चेहरा आगे नहीं किया,पद पाने के लिए चेहरा चमकाया नहीं.इसकी ज़रूरत भी नहीं है.इमारत ने मजलिस ए शूरा बना रखा है.शूरा के 101 सदस्य हैं.एक अलग से कमिटी भी है.उसमें 800 से अधिक सदस्य हैं.यही दोनों मिल कर अमीर ए शरीयत का चुनाव करते हैं.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ अमीर ए शरीयत के पद पर विराजमान होने के लिए बड़े पैमाने पर जोड़तोड़ -लॉबिंग चल रही है.अमीर ए शरीयत का ओहदा बहुत बड़ा है.ज़िम्मेवारी वाला है.क़ौम तय करती है कि उसका अमीर समुदाय और समाज के लिए कितना सूदमंद साबित हो सकता है.वह न सिर्फ शरीयत का अमीर होता है,क़ौम का रहबर भी होता है,सही रहनुमाई उसकी ज़िम्मेदारी है.इसलिए,अबतक इमारत के जो भी अमीर ए शरीयत हुए उन्होंने अपना चेहरा आगे नहीं किया,पद पाने के लिए चेहरा चमकाया नहीं.इसकी ज़रूरत भी नहीं है.इमारत ने मजलिस ए शूरा बना रखा है.शूरा के 101 सदस्य हैं.एक अलग से कमिटी भी है.उसमें 800 से अधिक सदस्य हैं.यही दोनों मिल कर अमीर ए शरीयत का चुनाव करते हैं.

शूरा की पिछले महीने वर्चुअल मीटिंग भी हुई थी.अमीर ए शरीयत के चुनाव को लेकर निर्णायक फैसला नहीं हो सका.सिर्फ यह बात तय पायी कि अमीर ए शरीयत के चुनाव के लिए पांच सदस्यीय कमिटी का गठन होगा.जो चुनाव की रणनीति बनायेगी.सवाल यह है कि जब शूरा पहले से मौजूद है.किसी भी तरह का निर्णय लेने का उसे पूर्ण अधिकार है तो अलग से कमिटी का गठन की जरूरत क्या है?क्या यह शूरा के अधिकार को अंडरˈएस्‌टिमेट्‌

करना नहीं हुआ?वर्चुअल मीटिंग में शूरा के कई सम्मानित सदस्यों ने आरोप लगाया कि उनकी आवाज़ को दबा दी गयी.इमारत में यह हो क्या रहा है?आम ज़बान पर चर्चा है,अख़बारों में हर रोज़ छप रहा है,अमीर ए शरीयत के लिए लॉबिंग हो रही है.कहीं शताब्दी समारोह के नाम पर जलसा चल रहा है,व्यक्ति विशेष का स्वागत-सत्कार हो रहा है,अवार्ड दिये जा रहे हैं तो कहीं हस्ताक्षर अभियान चल रहा है.दोनों हज़रात गंभीर उम्मीदवार हैं.वो कुछ नहीं बोल रहे,उनके समर्थक कुछ ज़्यादा बेचैन आत्मा बने हुए हैं.यह नहीं मालूम कि इस मुहिम में उनकी कितनी सहमति है.लेकिन जो खेला चल रहा है वह इमारत के उसूल के बरक़्स है.इससे इमारत की बुनियाद डालने वाली शख़्शितों की रूह ज़रूर बेचैन होगी.

अमीर ए शरीयत उसे ही बनना चाहिये जिसके अंदर शरई,सामाजिक और सियासी बसीरत हो.हर कोई मौलाना मोहम्मद वली रहमानी या मौलाना मुजाहिद इस्लाम क़ासमी तो हो नहीं सकता मगर इमारत को संजो कर,क़ौम को समेट कर चलने में जो योग्य हो,उसे अमीर ए शरीयत बनना चाहिए

इमारत ए शरिया की बुनियाद आज से सौ साल पूर्व फिरंगियों से लोहा लेने के लिए 500 उलेमा ए अकराम ने सिर जोड़ कर डाली थी.मुसलमानों की धार्मिक-सांस्कृतिक और भारत की आज़ादी,साझी विरासत की अंग्रेजों से रक्षा के लिए इस संस्था की स्थापना की गयी थी.हालात आज भी कोई बेहतर नहीं है.साझी विरासत और धार्मिक मूल्यों की रक्षा बड़ी चुनौती है.ऐसे में इमारत ए शरिया की जवाबदही कुछ ज़्यादा बढ़ जाती है.इमारत ए शरिया का दायरा बड़ा है.एक तरफ यह धार्मिक समूहों को जोड़ता है तो सामाजिक दायित्वों का निर्वाह भी करता है.गाहे-बगाहे सियासी रहनुमाई भी इसकी ज़िम्मेदारियों में शुमार है.अमीर ए शरीयत उसे ही बनना चाहिये जिसके अंदर शरई,सामाजिक और सियासी बसीरत हो.हर कोई मौलाना मोहम्मद वली रहमानी या मौलाना मुजाहिद इस्लाम क़ासमी तो हो नहीं सकता मगर इमारत को संजो कर,क़ौम को समेट कर चलने में जो योग्य हो,उसे अमीर ए शरीयत बनना चाहिए और यह लॉबिंग से नहीं होगा.शूरा और इमारत की आठ सौ सदस्यीय कमिटी को ही तय करने दीजिए.अपना चेहरा चमकाना बंद कीजिए.यह इमारत के हक़ में होगा और क़ौम पर अहसान!

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