दोस्त और दुश्मन दोनों की नजर आज केन्द्रीय इस्पात मंत्री रामचंद्र प्रसाद सिंह के मेगा शो पर टीकी हुई है. इस मेगा शो को ललन सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार पटना पहुंचने के बाद हुए ज़ोरदार स्वागत से कई गुणा अधिक कारगर साबित करने की पूरी तैयारी है.

पटना/कमला कान्त पांडेय

दोस्त और दुश्मन दोनों की नजर आज केन्द्रीय इस्पात मंत्री रामचंद्र प्रसाद सिंह के मेगा शो पर टीकी हुई है. इस मेगा शो को ललन सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार पटना पहुंचने के बाद हुए ज़ोरदार स्वागत से कई गुणा अधिक कारगर साबित करने की पूरी तैयारी है. राजधानी पटना समेत सम्पूर्ण बिहार में यह देखा जा रहा है. मेगा शो यह भी साबित करेगा कि बिहार में कितना काम बतौर संगठन महासचिव आरसीपी सिंह ने किया है और जदयू पर उनकी कितनी पकड़ कायम है. वैसे खासकर स्वजातीय के साथ साथ पिछड़ी-अतिपिछड़ी जातियों में काफी उत्साह देखा जा रहा है. एक बात गौर करने वाली यह है कि ललन सिंह के स्वागत में एक खास वर्ग के लोगों का जुटान था. जो इसमें नहीं देखा जा रहा है. पटना समेत अन्य जिलों में भी आरसीपी सिंह समर्थक बैनर, पोस्टर और होर्डिंग लगाकर जोरदार स्वागत करने के लिए आह्वान कर रहे हैं.


अभय कुशवाहा के युवा जदयू प्रदेश अध्यक्ष रहते प्रियरंजन पटेल, गुडडू सिंह, सत्यप्रकाश यादव, इन्द्रकान्त विश्वकर्मा जैसे पदधारकों ने अपनी क्षमता पूरी तरह झोंक दी है. अभय कुशवाहा तो सिर्फ अपने गृह जिला गया से साढ़े तीन सौ गाड़ियों में भरकर समर्थकों के पटना पहुंचने का दावा कर रहे हैं. इसमें कितनी सच्चाई है यह तो वक्त बताएगा. विधायक और विधान पार्षद के आवास पर बीते कल से ही जदयू समर्थकों का जूटान जारी है. रहने-खाने की भी व्यवस्था की गई है. रैली की तरह इंतजाम और तामझाम देखने को मिल रहा है. वैसे, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मौन धारण कर पोस्टर विवाद से लेकर चल रहे शक्ति प्रदर्शन को काफी पैनी निगाह से देख और समझ रहे हैं. फिर, मूल्यांकण करेंगे कि ललन सिंह और आरसीपी सिंह में पार्टी के लिए कौन कितना भविष्य में कामयाब हो सकता है. हालांकि, जदयू राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह भी अपने विश्वस्त समर्थकों के द्वारा पल पल की ख़बर ले रहे हैं.


बहरहाल, जनता दल युनाइटेड के निवर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष व संगठन प्रभारी रामचंद्र प्रसाद सिंह ने केंद्रीय इस्पात मंत्री बनने के बाद जो पहला महत्वपूर्ण बयान दिया था वह था- “मैं पार्टी अध्यक्ष और मंत्री दोनों ही जिम्मेदारियों को एक साथ निभाने में बखूबी सक्षम हूं”. उनके इस बयान का सिर्फ और सिर्फ एक ही अर्थ है- वह केंद्रीय मंत्री के साथ जनता दल युनाइटेड के अध्यक्ष दोनों पदों पर बने रहना चाहते थे.
अब नीतीश कुमार के एक पुराने बयान पर गौर करें. पिछले वर्ष उनसे पूछा गया था कि अब पार्टी कौन संभालेगा? उन्होंने बेलाग लपेट जवाब दिया था “आरसीपी बाबू”. लेकिन अचानक परिस्थितियां बदल गयीं. आरसीपी सिंह जदयू के अध्यक्ष बने और बमुश्किल आठ महीने में निवर्तमान भी हो गये. जदयू के गठन से आज तक आरसीपी सिंह सबसे छोटी अवधि के अध्यक्ष के रूप में कलेंडर में दर्ज हो गये. ऊपर दर्ज बातों से यह स्पष्ट था कि नीतीश यह मान चुके थे कि आरसीपी सिंह बतौर अध्यक्ष लम्बी पारी खलेंगे. जहां वह नीतीश के विश्वास पात्र थे वहीं वह उनके स्वजातीय भी हैं. नीतीश कुमार 1999 में रेल मंत्री बने थे. तब आरसीपी सिंह यूपी कैडर के आईएएस अफसर थे, जिन्हें नीतीश ने अपने मंत्रालय में बुला लिया. 2005 में जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तब फिर से आरसीपी सिंह उनके सचिव की भूमिका में आ गये.


नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह की जगह राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह को अध्यक्ष बना दिया. महज आठ महीने में अचानक क्या हुआ कि नीतीश कुमार ने आरसीपी को झटके में अध्यक्ष पद से हटने पर मजबूर कर दिया? इस सवाल का जवाब 2019 में नरेंद्र मोदी की कैबिनेट गठन की घोषणा में छिपा है. तब नरेंद्र मोदी ने जदयू को एक कैबिनेट मंत्री का पद देने की बात कही थी. नीतीश इसके लिए राजी नहीं थे. उधर आरसीपी सिंह की महत्वकांक्षा उफान मार रही थी. वह हर हाल में मंत्री बनना चाहते थे. वह कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ लेने दिल्ली पहुंच गये. उनके समर्थक भी पटना से दिल्ली में डेरा जमा चुके थे. लेकिन अचानक नीतीश कुमार ने फैसला किया कि एक मंत्रिपद स्वीकार नहीं किया जा सकता. इस फैसले के बाद आरसीपी का सपना धरा का धरा रह गया. फिर 2021 में कैबिनेट विस्तार का फैसला मोदी सरकार ने लिया. फिर वही शर्त थी- एक मत्री पद. 2019 और 2021 का फर्क यह था कि तब तक आरसीपी सिंह जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके थे. लिहाजा मंत्रिपद की संख्या या कौन मंत्री बनेगा, इस बात का फैसला आरसीपी सिंह को लेना था. नीतीश बड़ी खामोशी से आरसीपी सिंह की अग्निपरीक्षा लेने का इंतजार कर रहे थे. उधर पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद आरसीपी खुद की शक्ति को तौल नहीं सके और न ही नीतीश कुमार की खामोशी को पढ़ सके. वह नीतीश कुमार को समझ पाने में नाकाम रहे. नतीजा सामने है.


आरसीपी ने जीतन राम मांझी प्रकरण से सबक लिया होता तो आज हालात कुछ और होते. नीतीश कुमार बयानों के बजाये एक्शन को अधिक तरजीह देते हैं. उन्होंने 2014 में भाजपा से अलग हो कर लोकसभा चुनाव लड़ के बुरी तरह हारने के बाद रातों रात जीतम राम मांझी को सीएम बना दिया था. इस उम्मीद से कि मांझी उनके वफादार बने रहेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मांझी की राजनीतिक महत्वकांक्षा जागी और अपनी लाइन पर चल निकले. नतीजा यह हुआ कि मांझी को नीतीश ने किनारा लगा दिया. आज नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को दूसरा मांझी बनने से पहले किनारा लगा दिया. भविष्य में नीतीश अगर सियासी रूप से शक्तिशाली बने रहे तो आरसीपी को और भी किनारा लगा सकते हैं.लेकिन यह आरसीपी के आज के स्वागत पर निर्भर करेगा.

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